" परिवार का बदलता परिपेक्ष "
जितना छोटा होता गया परिवार उतने छोटे होते गए मूल्य और संस्कार। यहीं सच्चाई हैं जैसे जैसे हम अपने दायरो को सिकोड़ते गए उतने ही अपनों के अपनेपन से वंचित होते गए.. पहले लोग जॉइट फॅमिली से अलग अपना परिवार बसाना चाहते थे ताकि अपने बच्चों का लालन पालन अपनी सुविधा अनुसार कर सकें लगता था की वो परिवार से विलग होकर ही संभव होगा,, इसलिये परिवार जो दादा दादी ताऊ ताई चाचा चाची बुआ बहनों भाइयों से भरे थे वो टूट कर मै और मेरे बच्चे तक आ गए थे!!परंतु अब के समय की विडंबना देखिये की जिन बच्चों की बेहतरीन परवरिश का बहाना था अलग होने का कारण आज वही बेहतरीन पीढ़ी माँ बाप के साथ रहना पसंद नहीं करती उसे अपना बेहतरीन स्पेस चाहिए जिसमें परिवार के नाम पर मिले माँ पापा भी नहीं,,, एक या दो बच्चों का परिवार भी अब बोझ बन गया हैं न बेटे और न ही बेटी कोई साथ रहना चाहते!!!बेटा तो एक पल रह भी ले परंतु आधुनिक युग मै मातृ शक्ति को तो सबसे ज्यादा अकेले दम पर जीवन जिनें और अपनी शर्तो पर अपनी दुनियां बनाने का ऐसे फितूर चढ़ा हैं की न माँ बाप चाहिए न बहन भाई,,,,, ये कटु सत्य हैं आज के युग मै लड़कियों को परिवार नहीं चाहिए वो अकेले परिवार से दूर बंदिशों से दूर जिम्मेदारी से दूर बस खुद के लिए खुद का जँहा चाहती हैं और सबसे बड़ी विडंबना तो देखिये जिन्हें प्रभुजी ने सृष्टि के निर्माण का आधार बनाया वो इस जीवंत निर्माण की सृजन की प्रक्रिया की सहज प्रकृति को भी नहीं करना चाहती यानि अब बच्चे को जन्म दें उसके पालन पोषण से भी भाग रही हैं ये पीढ़ी,,, सब स्त्री के हाथ हैं वो चाहें तो काल को जीत सकती हैं चाहें तो काल भी बन समस्त सृष्टि तबाह भी कर सकती हैं अगर स्त्री सम्भले तो समाज और परिवार संभल जाये स्त्री चाहें तो सब बर्बाद.




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