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"स्त्री "

Mar 15
2 min read

ब्रह्माण्ड का जीवंत स्वरूप स्त्री जो निर्माण और सृजन कर्ता हैं जीवन की,,,,जीवनदायनी, पोषक, पालक और  हर मानव की प्रथम शिक्षक भी मातृ शक्ति ही हैं।स्त्री हर भूमिका  सहज ही निभा लेती है ..चाहें कुछ न आता हो पढ़ी- लिखी या अनपढ़ ही क्यों न हो परंतु अपने कार्यों मे सर्वदा संपूर्ण और सर्वोच्च रही हैं वो सदा। परंतु त्रासदी देखिये सदा कमतर और निम्न समझी गई उसी समाज और पुरुष द्वारा जिसे उसी ने जन्म देकर काबिल होने की राह दिखाई,,, ये संसार और सांसारिक ताना बाना उसी की प्रतिकृतियों से भरा हैँ बिन स्त्री तत्व के न घर हैँ न संसार और न ही होगा सामाजिक ताने बाने मे बंधा ये संस्कार संस्कृति और परम्पराओ का जीवन चक्र,,, सार भी हैँ वो और जगत मे अमृतमयी जीवन स्वाद भी हैँ वो। जीवन मे पंचतत्व रूपी हरेक कण वही तो हैँ... प्रकृति हैँ तभी पुरुष का अस्तित्व होगा! पर साबित क्यों और किसे करना और कब तक???? अगर स्त्री अपनी पहचान को खुद ही जान ले तब बात हैँ!स्त्री दूसरी स्त्री को मान दे तब बात है!,, ममता का सरोवर होकर खुद प्यासी क्यों? आध्या शक्ति होकर खुद शक्ति हिन् क्यों? अर्धनारिस्वर बने तो पुरुष पूर्ण होता हैँ और उसी पुरुष के सामने स्वंम को सिद्ध करने मे जीवन का सार भुला देती हैँ स्त्री,,,,, अपने मन के भीतर की ऊर्जा को सहेज ले तो भीतर बाहर दोनों और प्रकाशित हो जाए,, सृष्टि की सर्जनकर्ता का प्रकाश इस पुरे जँहा को आत्मिक, व्यवहारिक,और सामाजिक पारिवारिक स्तर पर श्रेष्ठ और दिव्य बना दे...विचार और व्यवस्था मे श्रेष्ठता उत्तम कोटि के समाज की रचना करती हैँ,,, जब पालक और रचियता अन्नपूर्णा और जीवनदायनी खुद को शोषित और पीड़ित अनुभव करें तो समाज विकृत ही होगा,,,,,, संभलना और सहेजना होगा स्त्री शक्ति को जीवनदायनी को तभी उसकी बनाई दुनियां पूर्ण प्रकाशित होंगी जब वो खुद को खुद की ऊर्जा को पहचान पाये और ये शुरुवात उसे

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