धर्म की राह...जीवन पद्द्तिक्या है धर्म या फिर यूँ कहे की आज के युग मे क्या परिभाषा बन गई है धर्म की कर्म की! क्या बस मंदिर जाना कर्मकांड जो दुनियां कर रही है देख वैसे ही करना... ये अनुसरण ही पुजा पाठ और पद्द्ति बनते जा रहे है?
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