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जिस दौड़ का कोई अंत नहीं

दौड़ रहा.. मानव दौलत के उस खजाने के लिए जिसके लिए अपनों को छोड़ा.और छोड़ कर ही कमाने निकला... अपनों के लिए ही कमाना है पर कमा ले ज़ब दौलत तो कहीं ख़र्च ना कर दें उन्हीं अपनों से  ही बचाना है! न उनके मन की  इच्छाये को पूरी करने मे ये दौलत लगने देंगे और  ना होंगी आपके खुद के  मन की इच्छा होंगी पूरी...क्योंकि हर इच्छा है एक दूसरे की नज़र मे गेरज़रूरी!!!चाहें थोड़ा सा ही कमा ले पर उसे अपनों के साथ अपनेपन से हर पल को जीते हुऐ बिताये!क्योंकि ज्यादा कमा कर  ज्यादा दम्भ मे भर लेगा खुद को और खुद की दौलत के भार से  उन्हीं को दबा कर रखना चाहेगा   मशीन बना ये मानव जिनके लिए कमाया है....ये कटु है परंतु सत्य है जो आपने कमाया नहीं वो ख़र्चने का हक नहीं रखते कहते है थोड़ा ही सही अपना आसमां और अपनी जमीं हो ताकि आपका बैठना और खडे होना मज़बूरी नहीं आपकी इच्छा हो,,,,,चार दिन की ही जिंदगी की हंसी और खुशी थी जिसे दिखावे के बैंक बेलेंस, जमीन जायदाद के ढेरों मे दबा जाओगे,,,,छोटे छोटे पलो मे सुकून और चंद खुशी थी साथ जीने और मुस्कुराते अपनों की उसे भी मुर्दे सा बेजान कर जीवन बेरंग और उदासी से भरा बनाओगे,उन्हीं अपनों का जिनके साथ हाथ थामे कसमे खाई जीवन की!!! तो कितना भी माल जोड़ लो मन भरे न इच्छा,,,, अपना कमाया फिर भी ख़र्च कर सकते है ओरो का ओरो के लिए कमाया नहीं,,,खुद के सपनो को मन की खुशी के पलो को जीवन का असल रंग बना लो क्योंकि जीवन भी एक ही देकर भेजा हैँ परम पिता नें दुबारा मिलेगा या नहीं इसका कोई जावबदेह नहीं हैँ,,, घर हो परिवार हो दोस्त हो रिस्तेदार हो सब के साथ बस हँसी और खुशियाँ भरे पल हो जहां  वही है असल जीवन और जीवन रस ,,, पल पल बीत रहा जीवन फिसल रहा बंद मुट्ठी से रेत सा...यँही कमाया यँही छोड़ा फिर किस फ़िक्र मे रात दिन अपनों से दूर दौड़ा..  ए मानव ठहर.थम जरा. बैठ जीवन के पास जीवन के साथ सिर्फ जिनें के लिए भी

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