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जीवन का परम धर्म "मानवता "

रची है सृष्टि उस परब्रह्म ने तो कुछ अति श्रेष्ठ सोच कर ही सब कृति बनाई होंगी क्योंकि उनका रचा कुछ भी मिथ्या या बिना किसी कारण के नहीं होता। उनकी हर रचना का कोई न कोई प्रारब्ध या नियति होती है अनंत कोटि ब्रमांड की अनंत कोटि सृष्टियों मै हम इस धरती के जीव भी शामिल है। मानव रूपी जीव को सबसे उत्कृष्ट और सबसे संवेदना भरा बना  उसमें मानवता का खजाना सभी जीवो से अधिक दिया है परब्रह्म ने जो हमें सभी जीवों मे सबसे अलग बनाता है। यहीं एक पूँजी हमें समस्त सृष्टि मै श्रेष्टम और सभी जीवो पर विजय प्राप्त कर अपने मुताबिक दुनियां चलाने लायक़ बनाती है। बुद्धि, ताकत, समझ, भाव, प्रेम, दया,करुणा सब हमें बक्शी...सबसे ऊपर है सिर्फ और सिर्फ मानवता जो  सबके प्रति प्रेम भाव से भरती हैं ये मानव को सिर्फ श्रेष्ठ बना सदा ईश्वर के समीप लें जाती है। यहाँ का कमाया सब यहीं रह जायेगा बस मानवता इंसानियत और परोपकार का कमाया दुआँवो का खजाना साथ लेकर वापिस प्ररब्रह्म तक जाना है.... यहीं इंसानियत का खजाना हमें जीव से मानव बनाता है वरना सिर्फ जीव जंतु बन रह जाते..जीवन मे सिर्फ मानवता को पकड़े रखे बाकि सब सहज है क्योंकि आज के परिवेश मे मानव बने रहना बहुत मुश्किल जीवन कि आपा धापी मे  मशीन बन रहा हैं आधुनिक युग का मानव कहीं खो सी रही आपसी प्रेम सौहार्द और अपनेपन और इंसानियत से भरी प्रेम स्नेह कि मानव से मानव को जोड़े रखने वाली रीत,,, कहीं रिते न रह जाये मानवता और इंसानियत से भरे शीतल रिश्ते नातो से भरे कटुंब कबीले समाज और गावं शहर क्योंकि पहले सब जुड़कर रहते थे नेह और मानवता के बंधनों से अब छीटक रही छुट् रही ममता और अपनेपन कि डोर,,मानवता, प्रेम सदभावना को सिंचित रखना ही होगा तभी मानव का मानव होना सार्थक होगा क्योंकि मानवता ही उसे सभी जीवों से अलग बना उच्तम पायदान पर रखती हैं

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