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धर्म की राह....जीवन पद्द्ति

क्या है धर्म या फिर यूँ कहे की आज के युग मे क्या परिभाषा बन गई है धर्म की कर्म की! क्या बस मंदिर जाना कर्मकांड जो दुनियां कर रही है देख वैसे ही करना... ये अनुसरण ही पुजा पाठ और पद्द्ति बनते जा रहे है?न नियम न संस्कार न वैदिक परम्परा बस पुजा करने का दिखावा मात्र बना दिया है धर्म को!! धर्म और कर्म आधारित जीवन शैली का वर्णन वेदों मे शास्त्रों मे जीवन को उत्तम से सर्वोतम बनाने वाला बताया गया है जँहा कर्म का प्रभाव धर्म को पूरा करने वाला होता है, फर्ज की सीमा कर्म और धर्म दोनों से बँधी हुई है। माता पिता से जन्म लेती जीवन धारा आजीवन उनसे फर्ज निभा धर्म रत कर्म करती है। दायरो और सीमाओं मे बंधा हुआ जीवन अनुशाशित और श्रेष्ठ बनता है। आजकल देखा देखी पुजा का मंदिर शिवालय जाने का कर्मकांड का अनुसरण तो करते है सभी,,, पर धर्म अनुसार परिवार मे रिश्ते मे माता पिता के आदर सम्मान मे फर्ज मे कुंठा और पीड़ा अनुभव करते है। धर्म कहता है पहले माँ पिता, सास ससुर और रिश्तों के फर्ज है वही धर्म और मंदिर पुजा की राह है।घर पर बैठी माँ से बनती नहीं पुजा की थाली का कोई महत्व नहीं। सामाजिक दायरे बंधन लगते है फर्ज और कर्म कष्ट देते है परंतु मंदिर के फेरे नित्य प्रति लगाने है। किसे मनाओगे मंदिर जाकर जब माँ और बाप और घर के नाते रिश्तों से कड़वाहट आपके मन मे है।पहले परिवार का फर्ज,सम्बन्ध का फर्ज निभाना सीखे भगवान तो स्वमं राजी। भाई के लिए भाई ने सब छोड़ा, हर रिश्ते के लिए त्याग की भावनाओ को सर्वोपरि समझा तो त्याग और सेवा रामायण का युग बनी। माँ का पिता का आदेश माना तो राम सीता कहलाये। धर्म के मार्ग पर मित्र और स्वजनों का साथ है तो हि सच्ची पुजा है संस्कार है... जब एक दूसरे का छीनने का, सबसे द्वेष, ईर्ष्या और लोभ लालच से जलन से मन और तन दोनों भर जाए और परिवार और अपने दोषी लगने लगे, बड़ो की कहीं �

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