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परम सत्य जीवन

ईश्वर के दिये इस जीवन को  हर हाल और हर परिस्थिति मै अगर मन से संतुष्ट हो जी लिया जाये और हर हालात को हरि इच्छा का प्रसाद मान उसी भाव मै खुद को ढाल लिया जाये तो पूर्ण समर्पण ही है जीव का परमात्मा के लिए। ऐसे प्राणी न तो स्वमं दुःखी होते है न किसी के दुःख का कारण बनते है। वरना आधा जीवन तो ये बताने मै निकाल देते है इसने ये क्यों किया ये क्यों कहा ऐसे वैसे जाने कैसे कैसे बस दूसरे की गलतियां ढूंढने और बताने मै व्यर्थ जीवन जाया,,,,,, मानव बस मानवता छोड़ बाकि हर बात को पकड़े मिलेगा और जिंदगी से जीवन बहा निरसता को औढ़े न खुद ढंग से जी पाये न किसी अन्य को आनंदमय देख पाये। जीवननिधि जो दी प्रभु ने उस आत्मा को फिर परमात्मा से जाकर वापिस साक्षात्कार कर सब वर्णन कर जीवन के रस राग फिर से सज्जित करने है एक नई देह नए उत्साह और नव निर्माण मै शामिल होने के लिए जीवन है जीने के लिए। प्रभु की बनाई हर कृति है अविस्मरणीय है हरेक जीव मात्र प्रभु का ही प्रतिबिम्ब है नज़र जैसी होंगी नजारे वैसे ही होते चले जाएंगे

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