"भक्ति का मर्म "
- pushpavashishtrani
- Mar 15
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अपने अंदर की शुद्धि,,, भक्ति का पहला भाव ही है दोषी हूँ, निर्गुण हूँ, पापी हूँ हे नाथ!मेरे दोषों को भुला मेरे सिर पर दया का अपना हाथ रखना 🙏🌹परंतु आज के युग का भाव देखो प्रभु मै तो बहुत अच्छा था मै तो बढ़िया था मैंने तो किसी के साथ बुरा नहीं किया मेरे साथ फलां, फलां घटना क्यों हुई? भगवान मेरे साथ ऐसे क्यों हुआ वैसे क्यों हुआ मतलब सिर्फ शिकायत वो भी दूसरों की,,, क्या इसे भक्ति कह सकते है क्या भगवान को नहीं पता आपको पता है इसलिए आप ही बताओगे???? ईश्वर के सामने जाओ तो सिर्फ निर्विकार किसी के लिए कोई भी विकार लिए गए तो वो सबसे बड़ी त्रुटि होंगी ईश्वर की नजर मै,,,, गिंनाने है तो अपने दोष गिनाने के प्रयास करों तभी आपको भक्ति, बुद्धि और भाव से सब समझा पाएंगे प्रभु जी क्योंकि एक वो ही है जो आपके विकारों से आपको बचा सकते है,,,, प्रभु आपको सब कुछ आपकी नियति के हिसाब से देते है क्या मिला क्या गया सब कुछ पहले से निर्धारित था सब समय और आपके कर्म आधारित फिर हर घटना का दोष किसी के माथे कैसे मढ़ते हैं लोग???? और पुरी जिंदगी बस यहीं करते हैँ,,,, और शिकायत भगवान को! जिस दिन भगवान और भक्ति का असली मर्म समझ गए खुद से आँख कैसे मिलेगी क्योंकि आत्मा मै भी परमात्मा बैठा हैँ,,,, मन को निर्मल और स्वच्छ कर ले तो दोष कहीं नजर आएंगे ही नहीं तो भगवान और भक्ति का मर्म समझ पाये




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