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सही दिशा

अपने बच्चों को सबसे आसान तरीके से समझाना चाहते हैँ  हम सभी।अक्सर हम शिक्षा प्रद बातें बता कर या उपदेश देकर  उन्हें समझाते  हैँ ताकि वो जीवन मै गलत न बने और न ही कुछ गलत करें। हर कोई चाहता हैँ उसके बच्चें उत्तम जीवन शैली और कर्म का निर्वहन करें इसमें कोई बुराई भी नहीं परंतु शायद समझ ही नहीं पाते की ये तरीका ही गलत हैँ उपदेशात्मक भाषा या भाषण किसी को अच्छा नहीं लगता बच्चों को तो हरगिज नहीं उन्हें तो खुद उदाहरण बन उनके सामने अपना आचरण श्रेष्ठ रख और व्यव्हार से मधुर भाषी और कर्तव्य परायण बन सिखाने की कोशिश भर की जाती हैँ। नित्य प्रति की आपकी और आसपास की घटित घटनाक्रम से सहज परवरिश से वो कुछ सिख पाये ऐसे प्रयास से प्रयत्न करना जरूरी हैँ,,, वरना ज़ब आज के मतलबी युग मै आपको मतलब मुताबिक व्यवहार करते देखते हैँ तो फिर क्या उम्मीद कर सकते हैँ??? सत्य हैँ हमारे अपने व्यवहार और आचरण के आईने को देख  कर ही बच्चें मूल चरित्र को गढ़ते हैँ जड़ो से जुड़ कर रहने से पौधे को वृक्ष के रूप सिंचित और विशाल बनाया जाता हैँ,,, ये प्रक्रिया निरंतर जारी रखनी पडती हैँ,,,, मानवता, भाईचारा, इंसानियत, दया करुणा और प्रेम का भाव एवं अपनों के प्रति समर्पण और कर्तव्य परायणता का भाव जब आपके जीवन मे होगा तभी उनमें स्थानांतरीत होगा क्योंकि ये गुण वंशानुगत प्रवाहित होते हैँ,,, अगर अपनी औलाद से उत्तम और उच्च कोटि के गुणों और व्यवहार की कामनाएं हैँ तो खुद को उदाहरण बनाये कुछ सीखना नहीं पड़ेगा स्वत ही देख कर सिखने की प्रक्रिया  जीवन मे आती जाएगी

 
 
 

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